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मैं शब्दों को छूता हूँ, और वो गुनगुनाते हैं… एक अनजाना-सा अहसास उंगलियों से बह कर मेरी क़लम मे समा जाता है और बन जाती है एक कविता…

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मैं गाँव पहुँचा …

पोस्टेड ओन: 27 Jan, 2012 Uncategorized में

मैं गाँव पहुँचा

(Written 27-Jan-2012)

 

गर्मी बड़ी थी…

धूप बिगड़ कर

सिर पर चढ़ी थी…

 

ऊमस मे लिपटे

आगे बढ़े थे,

तो लू ने करारे

तमाचे जड़े थे…!

 

ऐसे में पीपल

की छाँव पहुँचा,

बरसों गये, आज

मैं गाँव पहुँचा …

 

चौदह बरस में

ये क्या हो गया है?

ये गाँव कितना

पराया लगा है…

 

गलियाँ भी सब

अंजानी लगीं हैं,

जानी हैं, पर

पहचानी नहीं हैं…

 

ताई की आँखों में

अब प्यार कम है,

नहरों में पानी

की धार कम है,

ग़रीबी है, लेकिन

किसको है परवाह?

चूल्‍हे बुझे, पर

जलती चिलम है…!

 

आपस की जलन सब

जलाने लगी है,

आँखें बहुत कुछ

छिपाने लगीं हैं,

ताड़ी में तो

शर्म आती नहीं, पर

खेती में अब

शर्म आने लगी है…

 

दिलों से मोहब्बत

उतर सी गई है,

भीतर की आवाज़

मर सी गई है,

इंसाफ़ अगवा,

सच गुमशुदा है,

एक शान झूठी

बस रह गई है…

 

वो भी थे दिन जब

हर दिन हसीं था,

ईमान था, चाहे

पैसा नहीं था,

कुछ तो वजह है

कि माहौल बिगड़ा,

ये गाँव पहले

ऐसा नहीं था…!

 

क्या ऐसा हुआ, कि

ये बदलाव आया?

मैं सोच में था

फिर याद आया…

 

शहर की चमक में

ज़मीं छोड़ आए,

मैं, और कितने ही

मुँह मोड़ आए…

 

न जाते तो शायद

कड़ी जोड़ पाते,

मिल जुल के सारे

समय मोड़ पाते…

 

एक बार सोचा

कि बीड़ा उठाऊं,

शहर छोड़ वापस

यहीं लौट आऊँ….

 

पर गर्मी बड़ी थी…!

धूप बिगड़ कर

सिर पर चढ़ी थी……

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sumit के द्वारा
January 29, 2012
rudranath tripathi के द्वारा
January 29, 2012

ताई की आँखों में ………………पंक्तियाँ सर्वाधिक पसंद आई ……………आपको शानदार रचना के लिए बधाई …………………हिमांशु भाई

Ruhi के द्वारा
January 29, 2012

सुंदर सामाजिक रचना …जो लिखा है सब सच है…अगर हर गाँव रालेगन सिद्धि हो सके तो कितना अच्छा हो….

sinsera के द्वारा
January 29, 2012

हिमांशु जी, नमस्कार,
छोटे छोटे सुखों की खातिर कैसे लोग अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं , आप ने इसका बहुत सटीक चित्र खींचा है. बधाई..

akraktale के द्वारा
January 29, 2012

हिमांशु जी,
आधुनिकता की दौड़ में बदहाल गाँव के मर्म को बयाँ करती सुन्दर रचना. बधाई.

abodhbaalak के द्वारा
January 28, 2012

हिमांशु जी
बेहतरीन रचना, दिल को छू लेने वाली
ऐसे ही लिखते रहें
http://abodhbaalak.jagranjunction.com




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